Home » राशि फ़ल् » ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का महत्व

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का महत्व

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य आकाश में स्थित क्रांति वृत्त के राशि चक्र में एक दिन में लगभग एक अंश की गति से भ्रमण करता है। यह सदैव मार्गी होता है। यह सिंह राशि का स्वामी है जिसमें 1-20 अंश तक मूल त्रिकोण तथा 21-30 अंश तक स्वराशि में समझा जाता है। सूर्य मेष राशि के 1 अंश से 9 अंश तक उच्च तथा 10 अंश पर परम उच्च होता है। तुला राशि में 1-9 अंशों तक नीच तथा 10 अंश पर परम नीच का होता है। सूर्य अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है। चन्द्र, मंगल गुरु, सूर्य के मित्र, बुध सम, शनि व शुक्र शत्रु हैं। सूर्य द्वारा एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्रांति कहा जाता है। वर्ष में बारह संक्रांतियां होती हैं। सूर्य संक्रांति से 16 घटी पहले तथा 16 घटी बाद में पुण्य काल  होता है जो दान, जाप, उपासना, होम इत्यादि धार्मिक कार्यों के लिए उत्तम कहा गया है।
सूर्य का निसर्ग बल नव ग्रहों  में सबसे अधिक है। उत्तरायण में, अपने वार-होरा-नवांश में, स्व-मित्र-मूल त्रिकोण – उच्च राशि में, वर्गोत्तम नवांश में, दिन के मध्य में तथा लग्न से दशम स्थान पर  सूर्य सदा बली एवं शुभ फलदायक होता है। सूर्य से पहले स्थित ग्रह अधोमुखी हो कर अशुभ तथा बाद में उध्र्वमुखी हो कर शुभ फल देने वाले होते हैं। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है। वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। वेदों की  ऋचाओं में अनेक स्थानों पर  सूर्य देव की स्तुति की गई  है। पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति, प्रभाव, स्तुति मंत्र इत्यादि का वर्णन है। ज्योतिष शास्त्र में नव ग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है।
सूर्य का स्वरूप एवं प्रकृति
मत्स्य पुराण के अनुसार सूर्य  कमलासन पर विराजमान हैं। उनकी कांति कमल के भीतरी भाग जैसी है। वे सात अश्वों के रथ पर आरूढ़  हैं जो सात ही रज्जुओं से बंधे हुए हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार भी सूर्य कमलासन पर विराजमान हैं। उनके नेत्र पीले हैं तथा शरीर का वर्ण लाल है। उनका रूप तेजस्वी है तथा वस्त्र कमल के समान लाल हैं। ज्योतिष शास्त्र के प्रसिद्ध फलित ग्रंथों के अनुसार सूर्य पित्त प्रधान, चतुरस्र देह, अल्पकेशी, पिंगल दृष्टि, लाल वर्ण, तीक्ष्ण, शूर एवं अस्थि प्रधान है।
सूर्य का कारकत्व
पुराणों के अनुसार सभी प्राणियों की आत्मा सूर्य ही है। इन्द्रियों में नेत्रों का स्वामी सूर्य है। नेत्रों में कष्ट होने पर सूर्य स्तोत्र का पाठ करना कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा, नेत्र, पिता, प्रताप, आरोग्यता ,लाल रंग के पदार्थ, अस्थि, सिर, हृदय, उदर, महत्वाकांक्षा, राजनीति, राजा इत्यादि का कारक कहा गया है।
सूर्य और रोग
जन्म कुंडली में सूर्य यदि नीच-शत्रु राशिस्थ, पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो कर त्रिक में हो तो नेत्र कष्ट, हृदय रोग, सिर में  पीड़ा या रोग, पित्त जनित विकार, अस्थि रोग, ज्वर इत्यादि रोग प्रदान करता है।
दशा फल एवं समय- सूर्य जन्म कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार अपना  शुभाशुभ फल अपनी दशाओं में प्रदान करता है। सर्व प्रचलित विंशोत्तरी दशा के अनुसार सूर्य की महादशा 6 वर्ष की होती है। दूसरे ग्रहों की महादशाओं में अपनी अन्तर्दशा आने पर भी सूर्य का शुभाशुभ फल मिलता है। जन्म कुंडली में सूर्य शुभ फल दायक सिद्ध होता हो तो उसकी दशा में यश वृद्धि, स्वर्ण लाभ, पिता एवं राजा से लाभ, उद्योगशीलता, राज सम्मान, प्राकृतिक स्थलों पर भ्रमण होगा। यदि अशुभ फल देने वाला हो तो ज्वर, सिर पीड़ा, नेत्र कष्ट, पित्त की अधिकता, क्रोध, पिता को कष्ट, राजा से हानि, धन व यश की हानि, हृदय रोग, एवं कलह क्लेश होगा। 22-24 वर्ष की अवधि में भी सूर्य का शुभाशुभ फल मिलता है।
गोचर में सूर्य
जन्मकालीन चन्द्र से 3,6,10,11वें स्थान पर गोचर वश जाने पर सूर्य शुभ फल  प्रदान करता है। क्रमानुसार 9,12,4,5वां इनका  वेध स्थान है जहां किसी ग्रह के स्थित होने पर सूर्य का शुभ फल नहीं मिलता। सूर्याष्टक वर्ग में जिन राशियों में चार से अधिक शुभ बिंदु प्राप्त हैं उनमें गोचर वश जाने पर सूर्य का शुभ फल प्राप्त होगा। यह गोचर प्रभाव जानने  की  अधिक सूक्ष्म विधि है।
रत्न एवं धातु- सूर्य की धातु ताम्बा है। माणिक्य सूर्य का रत्न तथा लालडी उपरत्न है। सूर्य यदि  अशुभ फल देने वाला हो तो ताम्बे या सोने में माणिक्य या लालडी सूर्य के नक्षत्रों- कृतिका, उत्तरा फाल्गुनी व उत्तराषाढ़ में जड़वा कर रविवार को धारण करना चाहिए।
दान, जाप व व्रत
रविवार को सूर्योदय के बाद गेहंू, गुड़, केसर, लाल चंदन, लाल वस्त्र, ताम्बा, सोना तथा लाल रंग के फल दान करने चाहिये।

Leave a Reply

© 2012 lucknowsatta.com · RSS · Designed by TIV Labs