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किसका मनोबल बढ़ा रहे हैं कथित मानवाधिकारवादी

{डा. दिलीप अग्निहोत्री}

आतंकवाद पर कठोर रूख वाले देश में किसी आतंकी को दी गई वाली सजा पर सवाल नहीं उठाये जाते। यह बात सत्ता और समाज दोनों के स्तर पर होती है। इस प्रकार आतंकी संगठनों को संदेश मिलता है। उनका मनोबल कमजोर होता है। अमेरिका का उदाहरण सामने है। नाइन इलेवन के बाद उसने अपने गुनहगारों के व्ययपक स्तर पर सजा दी थी। अफगानिस्तान की तालिबान सत्ता को धूल में मिला दिया। बड़े-बड़े आतंकी सरगनाओं को अपना शेष जीवन चोरी छिप्पे बिताना पड़ता है।

मानवाधिकार और आतंकियों के अधिकार के बीच अन्तर किया गया। दोनों की तुलना नहीं की गई। सैकड़ों हजारों निर्दाेशों की जान लेने वालें आतंकियों के अधिकारों पर बहस कैसे हो सकती है। उनके अधिकारों का सम्मान कैसे किया जा सकता है। यह उन आतंकियों के व्यक्तिगत प्रकरण ही नहीं होते, वरन् इससे उस प्रवृत्ति के लोगों को संदेश जाता है। आतंकियों के मनोबल बढ़ाने वाले क्रियाकलापों, बयानों को भी अपराध की श्रेणी में रखना चाहिए। क्योंकि अन्ततः इससे मानवता और मानवाधिकार का नुकसान होता है।
यहां अमेरिका की प्रशंसा करना उद्देश्य नहीं है। उसके हमेशा स्वार्थ रहे है। इसी के तहत कभी उसने आतंकी संगठनांे को संरक्षण दिया था। लेकिन अन्तराष्ट्रीय जगत में स्वार्थ के साथ ही उसने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्चता दी। राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया। इसपे संदेह नहीं कि भारत और अमेरिका की भौगोलिक सामाजिक स्थिति में बहुत अन्तर है।
नाइन इलेवन को अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेन्टर पर आतंकी हमला हुआ था। उसने चुनौती स्वीकार की। जबर्दस्त जवाब दिया। करीब बारह वर्ष पहले भारत की संसद पर आतंकी हमले की साजिश हुई। यह भारत के संसदीय तंत्र पर हमले का प्रयास था। आतंकी संसद परिषद में दाखिल हो चुके थे। यह संयोग था कि उपराष्ट्रपति की फ्लीट वहां से निकलने की तैयारी में थी। उनका सुरक्षा अमला हरकत में था। उसने आतंकी संकट को समझा। उसका मुकाबला किया। अपनी जान देकर संसद की सुरक्षा की। अन्यथा जो होता उसकी कल्पना करना भी मुस्किल था। 13 दिसंबर 2001 को हुए हमले के करीब छः महीने बाद दिल्ली पुलिस ने अपनी जांच पूरी कर ली थी। तत्कालीन पोटा न्यायधीश शिवनारायण धींगरा ने जून 2002 में मामले का परीक्षण शुरू किया। प्रतिदिन मामले की सुनवाई की। 18 दिसंबर 2002 को फैसला सुनाया। अफजल को गुनहगार मानते हुए फांसी की सजा दी गई। न्यायिक प्रक्रिया का पालन हो रहा था। अभियुक्तों ने उच्च न्यायालय में अपील की। यहां 29 नवंबर 2003 को अफजल को दोषी मानते हुए सजा बरकरार रखी। सर्वोच्च न्यायालय में मामला पेश हुआ। 4 गस्त 2005 को उसने भी निर्णय को सही माना। करीब साढ़े तीन वर्ष मामले की न्यायिक सुनवाई चली। न्यायपालिका किसी निर्दोश को सजा न देने के अपने दायित्व से बहुत सतर्क थी। इसीलिए एक अन्य अभियुक्त गिलानी को रिहा कर दिया गया था। अफजल के खिलाफ सबूत पुख्ता थे। किन्तु सजा पर अमल में साढ़े आठ वर्ष का समय लगा। इस दौरान भारत आतंकवाद के खिलाफ कठोर रूख का संदेश नहीं दे रहा था। दकर हुई लेकिन अन्ततः न्याय की जीत हुई।
यह संतोषजनक है कि भारत के आम नागरिकों के न्यायिक प्रक्रिया के अंजाम तक पहुंचने का स्वागत किया। इनमें हिन्दू-मुसलमान सभी शामिल थे। अनेक मुस्लिम धर्म गुरू भी स्वागत करने वालों में शामिल थे। सत्ता और विपक्षी पाट्रियों ने एक स्वर से सहमति व्यक्त की। यह राष्ट्रीय मसले पर सहमति व्यक्त करने का अवसर था। लेकिन कतिपय मानवाधिकारवादी, हुर्रियत नेता, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री सहित अनेक लोग इस राष्ट्रीय सहमति के साथ नहीं थे। जम्मू-कश्मीर घाटी के केवल चार शहरों में अफजल को मिली सजा का विरोध हुआ। जम्मू व लद्दाख सहित अनेक हिस्सों में लोग राष्ट्रीय सहमति के साथ है।
जाहिर है कि न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान रखने वालों की संख्या बहुत सीमित थी। लेकिन इसे कुछ लोगों के विचार मानकर नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । इनके बयानों विश्लेषण करें तो साफ होगा कि ये सीमापार के आतंकी संगठनों का मनोबल बढ़ा रहे थे। ये मानवाधिकार के लिए नहीं आंतकियों के अधिकार हेतु बेकरार थे। भारतीय नागरिक और हर्रियत नेता यासीन मलिक जैसे लोगों को पाकिस्तान से उम्मीद थी। भारत का गुनहगार, मुंम्बई हमले का मुख्य आरोपी, सैकड़ों निर्दोष लोगों का जीवन अधिकार छीनने वाला आतंकी सरगना उनका हमसफर था। उसी के साथ यासीन मलिक इस्लामाबाद में अफजल की सजा का विरोध कर रहे थे। दोनों अनशन पर थे। विडम्बना देखिए, इन्हें पाकिस्तान से ही बहुत बड़ी ’खुराक’ मिलती है। वहीं अनशन करके अपने नंबर बढ़ाने का प्रयास कर रहा था। हुर्रियत के अनेक नेता पाकिस्तान से मिलने वाली बड़ी आर्थिक सहायता के चलते ऐशो-आराम की जिंदगी जीते है। ऐसे लोग परोक्ष-अपरोक्ष से मौत के वास्तविक सौदागर है। इनके रहनुमा पाकिस्तान में है।
गौर कीजिए, यहां से लेकर सीमापार तक विरोध करने वालों के स्वर एक जैसे है। आतंकियों के हाथों मारे गये निर्दोश नागरिकों, जवानों के प्रति इनकी संवेदना कमी दिखाई नहीं देती। तब ये मानवाधिकार की बात नहीं करते। तब ये कोई प्रश्न नहीं उठाते, बहस नहीं करते, तर्क नहीं देते। लेकिन न्यायपालिका पूरी प्रक्रिया का पालन करके अपराधी आतंकी को सजा देतर है, तब ये मानवाधिकार के लिए आसमान सिर पर उठा लेते है। अफजल के आरोप पर सुनवाई और सजा पर अमल में ग्यारह वर्ष से अधिक समय लगा। न्यायपालिका सबूतों के आधार पर निर्णय पर पहुंची। सजा देने के दौरान अपनाई गई गोपनीयता भी सराहनीय थी। ऐसा न होता तो सबसे अधिक परेशानी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को होती। घाटी के चार पांच शहरों में उन्हें अधिक अराजकता का सामना करना पड़ता। उनके विचार हालात को बिगाड़ने का काम करते है। वह युवा अफजल को नई पीढ़ी से जोड़ते है। यह बहुत गलत संदेश है। नई पीढ़ी आतंकी मानसिकता से अलग होनी चाहिए। उसे विनाश नहीं विकास के रास्ते पर चलना चाहिए। अफजल, यासीन जैसे लोग नहीं, वरन् शमी अहमद और शाह फैजल जैसे लोगों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
आतंकियों ने देश की व्यवस्थापिका पर हमले का प्रयास किया था। आज कतिपय लोग न्यायपालिका पर अपने बयानों से हमला कर रहे है। क्या यह देश को कमजोर करने तथा सीमा पार के आतंकी संगठनों का मनोबल बढ़ानें का प्रयास नहीं किया है।

 

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