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रामसेतु पर सरकार दुस्साहस

डा. दिलीप अग्निहोत्री

नीयम ठीक न हो तो तमात तर्क बेमानी हो जाते है सेतु समुद्रम परियोजना पर सरकार की स्थिति ऐसी है। वह राम सेतु के विध्वंश में किसी भी हद तक जाने को तैयार है। इसलिए उसने परियोजना से संबधित धार्मिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आपत्तियों को खारिज कर दिया गया है। जनहित और जनभावना का सम्मान करने वाली किसी सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन केन्द्र सरकार इससे बेपरवाह है। इस मामले में उसकी सक्रियता रहस्यमय है। रामसेतु के धार्मिक महत्व पर प्रश्न उठाना अनुचित है। यह देश के बहुसंख्यकों की आस्था से खिलवाड़ है। सरकार ने यही किया। उसने सर्वोच्च न्यायालय में दायर हलफनामें में अपने दुस्साहस का परिचय दिया। इसमें कहा गया कि रामसेतु के धार्मिक महत्व का कोई आधार नहीं है। पचैरी समिति ने सेतुसमुद्रम से होने वाले पर्यावरण के भारी नुकसान का उल्लेख किया था। सरकार ने हलफनामें में उसे नकार दिया। परियोजना से होने वाले आर्थिक लाभ के दावों पर भी अनेक विशेषज्ञों ने प्रश्न उठाये थे। सरकार ने उस पर विचार करना आवश्यक नहीं समझा। वट हलफनामा बनाते समय अपनी धुन में थी। बड़े आर्थिक लाभ का दावा किया गया।
जाहिर है कि सरकार ने धार्मिक, आर्थिक, प्राकृतिक मुद्दों की अवहेलना की है। उसकी नजर में रामसेतु केवल एडम ब्रिज है। यह आस्था का विषय नहीं है। ऐसी बात वही कर सकता है, जिसे भारत के लोगों की आस्था पर विश्वास नहीं है। रामकथा से रामसेतु को अलग नहीं किया जा सकता। लंका पहुंचने के लिए बनाये गये सेतु की पूरी पृष्ठभूमि धार्मिक ग्रन्थों में हैः-
विनय मा मानत जलधि-जड़।
गए तीन दिन बीत।।
बोले राम सकोप तब।
भय बिनु होई न प्रीत।।
वस्तुतः यह राम सेतु निर्माण की प्रारम्भिक प्रक्रिया है। जो धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। धीरे-धीरे इसमें योगदान करने वालों की संख्या बढ़ती है। जो अन्ततः बहुत उच्च तकनीक तक पहुंचती है।
नाथ नील-नल कपि द्वयभाई।
लरकाई रिसि असिस पाई।।
तिनके परस किए गिरि भारी।
तरिहै जलधि प्रताप तुम्हारे।।
क्या यह नहीं माना जा सकता कि निर्माण के देवता विश्वकर्मा से प्रेरित नील और नल उच्च कोटि के अभियंता थे। उनके पास विशेष तकनीक थी। आज इसे कल्पना कहा जा सकता है। विमानों के निर्माण के पहले पुष्पक विमान भी कल्पना में थे।
ये बात अलग है कि इन सबपर बहस हो सकती है। लेकिन आस्था विश्वास बहस से ऊपर होते है। कल्पना कीजिए, रामसेतु कीजिए राम सेतु की जगह किसी अन्य मजहब का प्रतीक होता। तक भी क्या सरकार ऐसा ही मंसूमबा दिखाती। क्या तब भी सरकार ऐसा ही हलफनामा बनाती। याद कीजिए, पूर्व पर्यावरण मंत्री अम्बिका सोनी के कार्यकाल में भी एक हलफनामा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल किया गया था। उसमें भगवान राम के अस्तित्व पर ही संदेह व्यक्त किया गया था। उसमें सरकार कहना चाहती है कि जब राम नहीं थे, तब राम सेतु कैसे हो सकता है। यह कैसी मानसिकता थी। राम के बिना भारत की कल्पना कैसे की जा सकती है। राम है, तो रामसेमतु भी होगा। यह भौतिक रूप से प्रमाणित है। वैसे दबाव के कारण सरकार ने वह वाक्य हटा लिया था। लेकिन उसके एक सहयोगी आज भी अपनी बात पर कायम है। सरकार उन्हें खुश करने रखना चाहती है। उनके लिए दयालू अम्मल, अलगिरि और अथाह दौलत ही जीवन की सच्चाई है। सरकार को बताना चाहिए कि वह किसकी भावनाओं और आस्थाओं के साथ है।
इसी प्रकार सरकार ने पर्यावरण व आर्थिक पक्ष को भी नजरअंदाज किया है। 2008 में गठित आर0 के0 पचैरी समिति ने गंभीर निष्कर्ष निकाले थे। उनका दावा था कि इस परियोजना से संम्भावित आर्थिक लाभ के दावे खोखले है। तीस मीटर चैड़े, बारह मीटर गहरे तथा 167 किलोमीटर लम्बे इस मार्ग के बन जाने के बाद भी बड़े व्यापारिक जहाजों का आवागमन सुचारू ढंग से नहीं होगा। इसके विपरीत परिस्थितिक तंत्र पर बहुत खराब प्रभाव पड़ेगा। जिससे सुनामी जैसे विनाशकारी समुद्री तूफान उठेंगें।
यहां थोरियम के विशाल भण्डार है। ये बेशकीमती है। ये सभी नष्ट हो जायेगी। इनसे होने वाली आर्थिक हानि की भरपाई सेतुसमुद्रम परियोजना से संभव नहीं होगी।
भूगर्भ विशेषज्ञों के अनुसार भी चक्रवातों व भीषण लहरों का हाईस्किप जोन है। रामसेतु इनसे रक्षा करता है। उसके हटने से भारी विनाश होगा। 1860 में ब्रिटिश शासकों ने भी इस पर विचार किया था। लेकिन परियोजना को आगे बढ़ाने का साहस नहीं कर सके राजग सरकार ने योजना बनाई लेकिन क्रियान्यवयन से पहले उसे अव्यवहारिक मान की छोड़ दिया गया था।
संप्रग सरकार कर रही है कि परियोजना पर आठ सौ करोड़ खर्च हो चुके है। इस दलील का क्या मतलब है। आठ सौ करोड़ खर्च हो गये तो क्या विनाश की मंजिल तक पहुंचकर दम लेंगें। ऐसी बहुत सी योजनाएं सरकार ने अधर मेें छोड़ी है। लाखों करोड़ रू0 घोटालों की भेंट चढ़े है।  लेकिन रामसेतु पर ही इनती दिलचस्पी क्यों है। जबकि इससे न केवल आस्था पर प्रहार होगा, वरन् आसपास के लोगों का जीवन भी दाव पर लग जायेगा।

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