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राजनाथ की टीम में संवाद और संभवना

दिलीप अग्निहोत्री

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नें अपनी टीम में जोर का बदलाव धीरे से किया था। इसका असर दिखाई देंने लगा है। संसदीय बोर्ड में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को शामिल किया गया था। बोेर्ड में एक दर्जन सदस्य है। यहां पहुंचना प्रधानमंत्री पद की दावेदारी नहीं है। शिवराज सिंह चैहान की जगह नरेन्द्र मोदी को शामिल किया गया है। जाहिर है कि उपर से परिवर्तन समान्य लगा। परिवर्तन धीरे से किया गया। बिना घोषणा के नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के बीच मुकाबले की बात चल पड़ी। यह बात धीरे धीरे तेज हो रही है। आगामीं आम चुनाव में तक इससे पीछे लौटना कांग्रेस और भाजपा दोंनो के लिए मुश्किल होगा।
नरेन्द्र मोदी संसदीय बोर्ड में शामिल होना सैद्धान्तिक कदम था। भाजपा के स्थापना दिवस पर अहमदाबाद में उसका व्यवहारिक रूप दिखाई दिया। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह खुद अहमदाबाद पहंुचें। स्थपना दिवस पर आयोजित रैली में उन्होंनें नरेन्द्र मोदी को देश का सर्वाधिक लोकप्रिय नेता करार दिया। इशारा साफ था। मोदी को गुजरात से निकाल कर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया जा रहा है। वह संसदीय बोर्ड के समान्य सदस्य नहीं है। इस अपरोक्ष संदेश का प्रसारण स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष नें किया। पार्टी के शीर्ष पुरूष लाल कृष्ण आडवानी के सम्मान का ध्यान रखा गया। स्थपना दिवस पर दिल्ली में आयोजित समारोह में उनके योगदान का सरहना की गई। भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष नें उनके नेतृत्व में सरकार बनानें का विश्वास व्यक्त किया। इसे मोदी और आडवानी के बीच टकराव नहीं समझना चाहिए। दोंनों संसदीय बोर्ड में है। मोदी से अधिक सक्रियता की उम्मीद है। आडवानी का महत्व भी कम नहीं। उनसे मार्गदर्शन की पार्टी को अपेक्षा है। भाजपा कैडर आधारित पार्टी है। भावी प्रधानमंत्री की घोषणा का अधिकार किसी व्यक्ति विशेष में निहित नहीं है। पार्टी में नेताओं की कमीं नहीं। किसी एक पद के लिए कई नामों का उभरना आश्चर्यजनक नहीं लेकिन जिस प्रकार कई समान स्तर के नाम होंनें के बाद भी अध्यक्ष पद का निर्णय होता रहा है, वैसे हीं भावी प्रधानमंत्री पद का निर्णय हो सकता है।
राजनाथ की टीम का निर्माण भी तो इसी सहजता से हुआ है।जबकि किसी भी स्तर पर नेंताओं की कमीं नहीं थी। स्थपना दिवस समारोह के बाद राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भोपाल पहुंची। वहां के प्रदेश कार्यालय में उनका आगमन सात वर्ष बाद हुआ था। समारोह में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी शामिल हुए। यह अच्छा अध्याय था। उमा मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी है। उन्हें उत्तर प्रदेश में समेंटनें का प्रयोग गलत था। उसमें सुधार हुआ।
वरूण गांधी, अमित शाह, पदाधिकारी है। नरेन्द्र मोदी, उमाभारती, वरूण, अमित आदि के माध्यम से पार्टी नें सन्देश दिया हैै। तैतीसवें स्थपना दिवस पर यह सन्देश जोरदार ढंग से उठाया गया। इसमें विकास का मुद्दा भी शामिल किया गया।

यह सोंचना गलत है कि वरूणगांधी को शब्द का लाभ मिला है। उनके नाम के साथ गांधी उपनाम सच्चाई है। वह इन्दिरा गांधी के प्रपौत्र संजय गांधी के पुत्र है। वरूण को शब्द से अधिक कर्म लाभ मिला है। भाजपा में शामिल होंने ंके बाद उनकी निष्ठा पर कभी संदेह की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। वह स्टार प्रचारक है। उनकों देखनें सुननें के लिए लोग उमड़तें है। ऐसे में पार्टी उनकी लोकप्रियता का लाभ उठाना चाहती है। उन्हें महामंत्री बनाती है, इसमें गलत क्या। वैसे कई बार लोकसभा चुनाव हरानें के बाद राज्य सभा पहुुचनें वाले नेंता को भी किसी शब्द का लाभ तो मिलता ही है।
उत्तर प्रदेश मंे हुए बदलाव का भी दूरगामीं प्रभाव होगा। वरूण महासचिव बनंे। मुख्तार अब्बास नकवी उपाध्यक्ष पद पर कायम रहे। वह अल्पसंख्यक चेहरा है। पार्टी राष्ट्रीवादी सन्देश को बढ़ाना चाहती है। विनय कटियार, संतोष गंगवार, कलराज मिश्र, पदाधिकारी नहीं बनें। विनोद पाण्डेय को राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया। वह किसान और युवा मोर्चे में बहुत सक्रिय सदस्य रहे। उनकी नियुक्ति भविष्य को ध्यान में रखकर उठाया गया बड़ा कदम हो सकता है। फिलाल यह परिवर्तन साधारण लग सकता है। लेकिन संभव है किसान और युवा मोर्चे में उनके तेवरों का रिकार्ड देखकर उन्हें प्रदेश में चुनाव के मद्देनजर बड़ी जिम्मेंदारी दी जाए। उत्तर प्रदेश में पार्टी की दशा सुधारे बिना राष्ट्रीय स्तर का मंसूबा आसानी से पूरा नहीं हो सकता।

जाहिर है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन और स्थपना दिवस के संवाद भाजपा के लिए उत्साह जनक है। संभवनाऐं पहले की अपेक्षा बढ़ी है। पार्टी कितना लाभ उठा सकेगी यह तो भविष्य में पता चलेगा। इतना तय है कि जो नए संतुलन व समीकरण बन रहें है, उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

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