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सीबीआई की साख-सुधार पर सन्देह

डा. दिलीप अग्निहोत्री
केन्द्र सरकार ने दावा किया है कि सीबीआई को स्वायत्त बनाना चाहती है। मंत्रियों के समूह की सिफारिशों को रिकार्ड मंे लाने के लिये हलफनामा दायर किया गया। सर्वोच्च मंत्रियों के समूह का गठन किया था। जिसे सर्वोच्च न्यायालय मंे हलफनामा दाखिल करना था। सरकार ने न्यायिक औपचारिकता का पालन किया। उसने यह दिखाने का प्रयास किया कि वह अपनी तरफ से सीबीआई मंे सुधार चाहती है। वह नहीं चाहती कि सीबीआई सरकारी तोते के रूप में पहचानी जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने आजिज आकर यही नाम दिया था। जीओएम ने इक्तालिस पन्नों का हलफनामा दायर किया।  क्या ये पन्ने तोते को उड़ने का मंसूबा दे सकते हैं। प्रश्न फिर उसी नीयत का होगा। जिसने मजबूत पिंजड़ा बनाया, उसमंे सीबीआई को बैठाया, जांच की दशा, दिशा, गति और प्रभाव का निर्धारण होता था। सरकार, खासतौर पर विद्वान मंत्रियों का समूह इतना नादान भी नहीं। वह तोते को इतनी आजादी नहीं देना चाहेगा कि वह अपनी मर्जी से उड़े। किसी की ‘भाग्य पत्रिका’ को उठा ले। चुनाव के कुछ महीने पहले ऐसी फजीहत कौन चाहेगा। जबकि  कुछ महीने पहले ऐसी फजीहत कौन चाहेगा। जबकि कुछ बड़े घोटाले के तार प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच रहे हैं। आजाद तोता न जाने किसके भाग्य का सार्वजनिक खुलासा कर दे। इसके अलावा इसकी आजादी का असर केन्द्र सरकार की राजनीति पर भी पड़ेगा। संप्रग सरकार के मंत्री ऐसा क्यों चाहेंगे। सर्वोच्च न्यायालय मंे दाखिल हलफनामे के अनुसार सीबीआई निदेशक की नियुक्ति तीन सदस्यीय समिति करेगी। इसमें प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नेता विपक्ष शामिल होेंगे। इस प्रकार सरकार ने सीबीआई के कामकाज मंे स्वायत्तता के लिये उठाये जाने वाले कदमों की जानकारी सर्वोच्च न्यायालय को दी। मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश समिति में शामिल किया जा सकता है। निदेशक का कार्यकाल अधिकतम दो वर्ष होगा। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति की सहमति के बिना उसका स्थानान्तरण नहीं किया जा सकेगा। इतना ही नहीं सीबीआई के निदेशक को केवल राष्ट्रपति ही पद से हटा सकेगा। इसके साथ ही विधेयक भी पेश किया जायेगा। यह सीबीआई की वित्तीय स्वायत्तता के संबंध में होगा। एक जवाबदेही आयोग बनेगा। जो सीबीआई अधिकारियों पर लगे आरोपों की जांच करेगा। इसके अलावा सीबीआई निदेशक को अर्द्धसघ्ैनिक बलों के महानिदेशकों के समान वित्तीय शक्तियां प्राप्त होंगी। इसके बावजूद मंत्री समूह ने प्रस्ताव मंे पेंच बनाए रखने के लिये खास ध्यान दिया। संसद की प्रवर समिति की सिफारिशों को नजरंदाज किया गया। सीबीआई की स्वायत्तता के लिये दो विंग बनाने की बात थी। मंत्री समूह ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार करने की आवश्यकता नहीं समझी। नीयत साफ होती तो प्रवर समिति की उन सिफारिशों को शामिल किया जाता, जिन पर सहमति बन चुकी थी। तथा इन्हंे इस वर्ष के शुरू मंे मंत्रिमण्डल भी स्वीकार कर चुका था।
सीबीआई वर्षों से पुराने ढर्रे पर चल रही है। फिलहाल इसका संचालन दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना कानून डीएसपीईए-1963 के तहत चल रहा है। 1998 में विनीत नारायण मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद मामूली सुधार अवश्य हुआ। लेकिन इसकी कार्यपद्धति पर सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। समय-समय पर इसके राजनीतिक दुरुपयोग की आलोचना की गयी। कई बार इसमें बदलाव की मांग की गयी।
लेकिन इसे सर्वाधिक चर्चा संप्रग के शासन में मिली। इस सरकार के कार्यकाल में देश के सबसे बड़े घोटाले हुए। सिजसमंे हाई-प्रोफाइल लोग आरोपी थे। ऐसे में देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई से लोगों को उम्मीद थी। लेकिन जांच पर राजनीति का असर दिखाई दिया। यह किसी आम नागरिक या विपक्षी पार्टी का आरोप नहीं था। वरन् सुप्रीम कोट्र की समय-समय पर दी गयी टिप्पणियों व निर्देशों का निहितार्थ था। इसी के तहत सुप्रीम कोर्ट ने टू-जी जैसी घोटालों की रिपोर्ट सीधे उसे दिखाने का आदेश सीबीआई को दिया था।
इसी प्रकार कोयला घोटाले की सीबीआई की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर विश्वास नहीं किया था। इसकी रिपोर्ट भी सीधे सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का निर्देश था। कोर्ट की कड़ी हिदायत थी कि किसी भी दशा में रिपोर्ट सरकार के प्रतिनिधि को न दिखाई जाए। इस निर्देश की अवहेलना के कारण प्रधानमंत्री के करीबी मंत्री अश्वनी कुमार को हटना पड़ा था।
सरकार की यही नीयत आशंका उत्पन्न करती ह। चुनाव से पहले वह अपनी मुसीबत बुाने का काम क्यों करेगी। बड़े घोटालों की निष्पक्ष जांच र्हइु तो बात बहुत दूर तक जायेगी। इसीलिए मंत्री समूह ने बचाव और समय बिताने का पूरा ध्यान रखा। सीबीआई को स्वायत्तता के संबंध मंे संसद की प्रवर समिति वाली सिफारिशें थीं, लेकिन मंत्री समूह ने अपने ढंग से काम किया। निदेशक की नियुक्ति का मामला अवश्य ठीक है। इसमंे प्रधानमंत्री के साथ नेता प्रतिपक्ष व सुप्रीम कोर्ट के जज को रखा गया। इसमें पारदर्शिता होगी। किन्तु उसे हटाने का अधिकार बड़ी चालाकी से अपने पास रखा। यह निदेशक पर दबाव की भांति होाग। कहा गया कि राष्ट्रपति उसे हटा सकता है। इस निर्णय  के साथ संसदीय संवैधानिक व्यवस्था का प्रावधान लागू हो जाएगा। जिसके अनुसार राष्ट्रपति मंत्रिमण्डल की सलाह को एक बार लौटा सकता है। दुबारा वह मंत्रिमण्डल की सिफारिश के अनुसार काम करेगा। निदेशक को वित्तीय अधिकार देने संबंधी विधेयक का निर्माण व उसे पारित कराने में सरकार अपना यह कार्यकाल निकाल ले जाए, तो आश्चर्य नहीं होगा। निदेशक के स्थानान्तरण पर भी सरकारी नियंत्रण होगा।
इस प्रकार मंत्री समूह ने बहस की बड़ी गुंजाइश छोड़ी है। अभी सीबीआई की स्वायत्तता पर हलफनामा दाखिल हुआ। फिर विधेयक बनेगा। इसे संसद मंे पेश किया जायेगा। सैकड़ों की तादात में संशोधन आ जायेंगे। विधेयक स्थायी समिति में जाएगा। सरकार की इच्छा पूरी होगी। इस लोकसभा का समय बीत जायेगा।

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