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जल संस्थान के जल में भ्रष्टाचार के वायरस- (ऑपरेशन भाग एक)

जल संस्थान लखनऊ वैसे तो लखनऊ शहर की जल आपूर्ति के लिए स्थापित किया गया था। पर आजकल ये संस्थान कुछ अलग हो अंदाज मंे शहर वासियों को या कहे कि सरकार को पानी पिला रहा है। जो पानी शहर वासियों तक पहुॅच रहा है। वह भ्रष्टाचार की गंदी नालियों से गुजर कर आ रहा है। जनता द्वारा अक्सर ये शिकायतें की जाती है कि उन तक पहुॅचनें वाला पानी पीने लायक नहीं है। पर शायद ही किसी शिकायतकर्ता को यह पाता होगा की उन तक पहुॅचनें वाला पानी न सिर्फ गंदा है बल्कि उसमें भ्रष्टाचार के ऐसे वाइरस हैं जो कि नस्लों तक को बिमार कर सकते है।
देश मंे भ्रष्टाचार की दिनों दिन बढ़ोतरी हो रही है। इसके षिकार सभी होते है। कभी न कभी कही हम सबकों रिश्वत देनीं पड़ती है। या फिर कभी हमसे जबरन ले ली जाती हैं। भ्रष्ट सरकारी अधिकारी/कर्मचारी इसी तरीके से जनता को अपना शिकार बनाते है कभी कभी कागजो का हबाला देके तो कभी कानून का हबाला देकर। और फिर रिस्वत देने के बाद वही सारे काम हो जाते है। जो कि पहले उनके द्वारा नामुम्किंन बताये जाते है।
अक्सर आपने सुना होगा कि विभिन्न सरकारी विभागो में जो अलग-अलग ठेके पर कार्य कराये जाते हंै। उन में विभ्न्नि प्रकार की कमीशनप्रणाली लागु होती है। कभी-कभी यह कमीशन 20ः से शूरू होकर 40ः या 50ः प्रतिशत तक हो जाता है। इसका मतलब यह होता है कि सरकार द्वारा विकास के नाम पर किये जा रहे 100 रूपये में से 20 से 50 तक भ्रष्टाचार में चलेे जाते है। जल संस्थान लखनऊ का भ्रष्टाचार चरम पर है, यहा पर विकास कार्य के नाम पर कराये जा रहे ठेको के काम में कमीषन 50ः से 70ः तक है। यही नही बदहाली का रोना रोने वाले लखनऊ जा रहे है। संस्थान मंे कुछ कार्य तो ऐसे कराये जाते है जहां कमीशन 100ः है। जी हां सही सुना आपने इसका मतलब यह कि विभाग द्वारा विभाग के हित के नाम पर खर्च की गई पूरी धनराषि कुछ भ्रष्ट अधिकायिों एवं कर्मचारियों की भेंट चढ़ जाते है, मजेे की बात तो यह है कि बेइमानी की इस रकम को चोरी मंे शामिल अधिकरियों एवं कर्मचारियों को हिस्सेदार तरीके से बांटी जाती है आपको यह जानकर हैरत होगी कि हर महीनें होने वाली चारी लाखो में है। गरीबी और बदहाली झेल रहा लखनऊ जल संस्थान असल में करोड़पति है। पर चंद अधिकारी और कर्मचारी इसकी करोड़ो की कमाई में सेंध लगाये हुए विभाग हित के नाम पर आत्म हित में लगे हुए है।
लखनऊ जल संस्थान में हो रहे व्यापक भ्रष्टाचार के कारण हालत इतने बदतर है कि कर्मचारियों को उनकी तनख्वाह तक समय से नहीं मिल पाती है, यही नही कुछ कर्मचारियों की तो पंेशन तक का भुगतान नहीं हो पाता है। अक्सर अधिकारियों द्वारा संस्थान की बदहाली का हवाला देकर कर्मचारियों को टरका दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि सारे कर्मचारी लखनऊ के संस्थान के भ्रष्ट और बेईमान है। बल्कि ज्यादातर कर्मचारी ईमानदार और कर्मठ है। कई बार कर्मचारी संगठनों में जल संस्थान में हो रहे व्यापक भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई है पर रसूखदार अधिकारियो के सामनें इनकी आवजें दब गयी है।
कुछ कर्मचारी खुद ही ठेकेदार बन गये है, असल मंे ये कर्मचारी के कार्यालय सिर्फ सरकार को लाखो का चुना लगाने के लिए जाते है। इन लोगो को सरकार द्वारा दी जा रहा वेतन मेें कोई खास रूचि नहीं है। या यूं कहे कि इन लोगों के लिए नौकरी करने का मतलब रोज फर्जी बिल तैयार कर भुगतान करवाना और विभाग हित के नाम पर फर्जी ठेके निकाल उनका भुगतान कराकर माल अन्दर करना है।
ये कर्मचारी लालच में बेअंदाज होकर चोरी में लगे हैं। एक ही समानों की आपूर्ति एक ही माह में कई बार फर्जी कागजों में करवा लेतें हैं । यही नहीं इन समानों की फर्जी स्टोर इन्ट्री और फिर कागजों में ही इनका इस्तेमाल भी हो जाता है। इन सारे गोरख धंधे में अवर-अभियन्ता से लेकर कार्यालय के आला अधिकारी भी शामिल रहतें है। दरअसल जलसंस्थान, लखनऊ में आपूर्ति एवं विभागी कार्य करने वाली ज्यादातर निजी फर्म महज एक बिलिंग एजेंट मात्र भर है, और इन फर्मो को बिल मुहैया करवाने के एवज में अधिकारी बिल का 5 से 10 प्रतिशत अंश ही देते हैं। और बाकी का 90 से 95 प्रतिशत पैसा इन भ्रष्ट अधिकारियों एवं कर्मचारियों में बांटा जाता है। यही नहीं अपनी इस चोरी से ये भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी न केवल लखनऊ जल संस्थान को लाखों का चुना लगा रहें हैं। साथ ही साथ वाणिज्य कर विभाग को भी लाखों की चपत लगा रहें है। दरअसल जिन बिलों का भुगतान सिर्फ किसी समान की आपूर्ति के एवज में होता है, उन बिलों पर सेल्स टैक्स काटा ही नही जाता। यही वजह है कि फर्जी बिलों के भुगतान पर अधिकारी लगभग पूरा 90 से 95 प्रतिशत पैसा खा जातें हैं। और आपूर्ति कर्ता फर्म को बचा हुआ 5 से 10 प्रतिशत अंश दे दिया जाता है।
आम जनता भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा परेशान है। अक्सर इन परेशानी के बीच आम जनता में से कुछ लोग ऐसे होतें है जो किसी भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देने से इस आधार पर मना कर देतें है, कि मसलन 100 रू0 रिस्वत देने से बेहतर हम 200 रू0 सरकारी कोष में जमा करवा देंगे। पर क्या आप जानतेें है? कि कुछ भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी इतने शातिर हैं कि आप द्वारा जमा सरकारी कोष में जमा आपके पूरे के पूरे 200 रू0 बड़ी चालाकी से चोरी कर ले जातें है और इसकी भनक न सरकार को होती है और न ही आम जनता को इसका अंदाजा हो पाता है।
भ्रष्टाचार का प्रत्येक रूप घातक व समाज विरोधी होता है। लेकिन स्वच्छ जल की आपूर्ति का दावा करने वाला विभाग ही जब भ्रष्टाचार में डूबा रहता है, तो चिन्ता होती है। यह चिन्ता मनुष्य के स्वास्थ से जुड़ी है। जिसमें बच्चे भी शामिल है। जल संस्थान उनके साथ खिलवाड़ कर रहा है। यह अक्षम्य अपराध है। सरकार को इस पर रोकथाम हेतु कठोर रूख अपनाना चाहिए।

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